इस जमाने में कोई नहीं अपना

जमाने में कोई अपना नहीं है,
किसी से अब हमें खतरा नहीं है
· मुख्तार तिलहरी के सम्मान में मुशायरा, शायरों ने समां बांधा

बदायूं। कारवाने अमजद एकेडमी की ओर से मोहल्ला सोथा स्थित सादिक अलापुरी के आवास पर शाहजहांपुर से आए मेहमान शायर मुख्तार तिलहरी के सम्मान में मुशायरे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शहर के शायरों ने कलाम से श्रोताओं को खूब सराहा।
मुशायरे का आगाज़ शाकिर रजा बदायूंनी ने नात से किया, उन्होंने पढ़ा-
मुझको तयबा में बुलाएंगे हुजूर,
अपना दीदार कराएंगे हुजूर।
राजवीर सिंह तरंग ने कुछ यूँ सुनाया-
लब पर खुदा के नाम को रटता चला गया,
दुनिया की उलझनों से मैं बचता चला गया।

अरशद रसूल ने ग़ज़ल सुनाई-
जमाने में कोई अपना नहीं है,
किसी से अब हमें खतरा नहीं है।
अगर जहमत न हो इंसान बन जा,
यह मेरी राय है फ़तवा नहीं है।
संचालन कर रहे उज्ज्वल वशिष्ठ ने कुछ यूँ गुनगुनाया-
इरादा दौड़ने का कर लिया है,
अभी आता नहीं चलना सही से।
सादिक अलापुरी ने अपने अंदाज़ में सुनाया-
गश्त करती हैं खुशबुएँ उस दम,
जब कलंदर ज़मीं पे सोता है।
अहमद अमजदी बदायूंनी ने पढ़ा-
शराफ़त का सौदा हम न कर सकेंगे,
हमारे लिए ये कमाई बहुत है।

सुरेन्द्र नाज़ ने ग़ज़ल सुनाई-
एक तू ही सफर में अपना था,
सीट तू भी बदल के बैठ गया।
मुख्य अतिथि मुख्तार तिलहरी ने बदायूं को उर्वरा साहित्यिक धरती बताया और नए कलमकारों की हिम्मत भी बढ़ाई। उन्होंने कलाम सुनाया-
जिंदगी को जिंदगी भर जिंदगी समझा मगर,
जिंदगी फिर भी तलाशे जिंदगी करती रही।
अध्यक्षता कर रहे डॉ. मुजाहिद नाज़ ने पढ़ा-
खटकते हैं तिरी आँखों में क्यूं कर,
मसाजिद, वक्फ और रौज़े हमारे।
अहमद अमजदी बदायूंनी, सादिक अलापुरी ने सभी का आभार व्यक्त किया।

शकील भारती संवाददाता

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