चराग-ए सुखन के मासिक तरही मुशायरे में शायरों ने समां बांधा

बदायूँ। चराग-ए सुखन संस्था के मासिक तरही मुशायरे में शायरों ने समां बांध दिया। मोहल्ला सोथा स्थित कार्यालय फरशोरी हाउस पर आयोजित मुशायरे में बेहतरीन कलाम सुनाकर शायरों ने खूब वाहवाही लूटी। सबसे पहले दानिश बदायूंनी ने नाते पाक से आगाज किया। उन्होंने गजल सुनाई-
सुनेगा वो भला कैसे किसी की,
जो बेटा बाप की सुनता नहीं है।

कुमार आशीष ने होली गीत सुनाने के बाद गजल पढ़कर समां बांध दिया-
तू मेरा हो के भी मेरा नहीं है,
ये रिश्ते की तो परिभाषा नहीं है।

संचालन कर रहे युवा शायर अरशद रसूल ने भावनाएं यूं व्यक्त कीं-
अगर जहमत न हो इंसान बन जा,
ये मेरी राय है फतवा नहीं है।

सुरेन्द्र नाज ने कहा-
तुम्हारे नाम की रेखा नहीं है,
मिरे हाथों में वरना क्या नहीं है।

आजम फरशोरी ने कलाम पेश किया-
तेरे दामन पे गर धब्बा नहीं है,
मेरा किरदार भी मैला नहीं है।

सादिक आलपुरी ने जुदा अंदाज में सुनाया-
अभी तक जेबो दामाँ हैं सलामत,
जुनूँ हद को अभी पहुंचा नहीं है।

युवा शायर शम्स मुजाहिदी बदायूंनी ने गजल यूं पढ़ी-
है बदला शम्स हर इक शय का लेकिन
मुहब्बत को कोई बदला नहीं है।

इसके अलावा शहाबुद्दीन, सालिम फरशोरी, अबीहा, आहिल रसूल, रजत गौड़, आदि मौजूद रहे।

शकील भारती संवाददाता

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