
बदायूं। शहर के मोहल्ला सोथा स्थित फरशोरी मंजिल पर एक मुशायरे का आयोजन किया गया। मुहर्रम के हवाले से आयोजित इस मुशायरे में शायरों ने समां बांध दिया। उन्होंने कर्बला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश करते हुए बेहतरीन कलाम सुनाकर खूब वाहवाही लूटी।
अध्यक्षीय संबोधन में अनवर आलम ने कहा कि मुशायरों से एकता और भाईचारा बढ़ता है, ये महफिलें हमारी तहजीब को जिंदा रखने का काम करती हैं। कर्बला का वाकया हमें कुर्बानी के साथ-साथ जुल्म से लड़ने का पैगाम देता है। मुख्य अतिथि के तौर पर इंजीनियर वारिस रफी मौजूद रहे, जबकि संचालन अरशद रसूल ने किया।
सुरेन्द्र नाज बदायूनी ने नाते पाक से मुशायरे का आगाज किया। उन्होंने कर्बला के शहीदों को याद करते हुए सुनाया:
जो तुम पे गुजरे हैं करबल में हादसात हुसैन,
बयान कौन करेगा वो वाकयात हुसैन।
अंधेरा घोर अंधेरा, यजीद की हस्ती,
उजाला पाक उजाला तुम्हारी जात हुसैन।
डा. एहसान रजा बदायूनी ने कुछ यूं समां बांधा:
या नबी आप अगर ख्वाब में आते-जाते,
नींद से राब्ता हम और बढ़ाते जाते।
इंजीनियर वारिस रफी ने हजरत इमाम हुसैन को याद करते हुए पढ़ा:
दर्स देती है हमें यह सीरते इब्ने अली,
दीने हक की आबरू हैं हजरते इब्ने अली।
डा. इक्तिदार इमाम ने कर्बला का वाकया यूं बयान किया:
हक की खातिर जान मिटाने वालों ने,
शोहदा का इतिहास लिखा है मिट्टी पर।
सादिक अलापुरी ने कुछ यूं सुनायाः
जिंदगी का दूसरा रुख यूं दिखाते हैं हुसैन,
आयते कुरआन नेजे पर सुनाते हैं हुसैन।
संचालन कर रहे अरशद रसूल ने कर्बला की शान में सुनाया:
जुल्मो सितम के सामने सरमत झुकाइए,
पैगाम दे रही है शहादत हुसैन की।
शम्स मुजाहिदी बदायूनी ने मनकबत पेश की:
मंजूर था खुदा को भी कर्बल का वाकया,
ऐ शम्स वरना करता हिफाजत हुसैन की।
समर बदायूनी ने पढ़ा:
जिसको नबी ने बांधा है खुद अपने हाथ से,
दीने नबी के सर की वो दस्तार हैं हुसैन।
संयोजक आजम फरशोरी ने सभी का शुक्रिया अदा करते हुए अपने खयालात का इजहार यूं किया:
हैं उम्मती हुजूर के, अहले किताब हैं,
खुशवक्त आशिकाने रिसालत मुआब हैं।



कार्यालय संवाददाता आनंद प्रकाश